पटना: कहते हैं कि शिक्षा और नौकरी इंसान का भविष्य संवारती है, लेकिन जब इसी नौकरी को पाने की जद्दोजहद में युवाओं को अपनी जान की बाजी लगानी पड़े, तो सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े होना लाजिमी है। हाल ही में बिहार में आयोजित हुई बिहार पुलिस मद्य निषेध (Prohibition) परीक्षा के दौरान कुछ ऐसी ही तस्वीरें सामने आईं, जिन्हें देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर वायरल हो रहे वीडियोज़ चीख-चीख कर बयां कर रहे हैं कि हमारे देश के होनहार छात्र किन दुश्वारियों से गुजरकर परीक्षा केंद्रों तक पहुँचने को मजबूर हैं।
स्टेशनों पर 'अफरा-तफरी' और समंदर जैसी भीड़
परीक्षा के दिन बिहार के तमाम बड़े रेलवे स्टेशनों, खासकर पटना जंक्शन और पाटलिपुत्र जंक्शन का नजारा किसी महाकुंभ जैसा था, लेकिन यह कुंभ आस्था का नहीं बल्कि 'रोजगार की आस' का था। जैसे ही परीक्षा की तारीख नजदीक आई, सूबे के कोने-कोने से हजारों-लाखों परीक्षार्थी अपने घरों से निकल पड़े। नतीजा यह हुआ कि स्टेशनों पर पैर रखने तक की जगह नहीं बची।
वीडियो फुटेज में साफ देखा जा सकता है कि:
- प्लेटफॉर्मों पर खचाखच भीड़ जमा थी, जहाँ तिल रखने की भी जगह नहीं थी।
- ट्रेनें आते ही लोग खिड़कियों और दरवाजों से ऐसे लटक गए मानो जिंदगी की आखिरी गाड़ी छूट रही हो।
- हजारों अभ्यर्थी अपनी जान जोखिम में डालकर ट्रेनों की छतों पर और पटरियों के बीच से होकर जाने को मजबूर थे।
- भीड़ इतनी बेकाबू थी कि रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और स्थानीय पुलिस भी पूरी तरह बेबस नजर आई।
- होम डिस्ट्रिक्ट सेंटर्स (Home District Centers): जहाँ तक संभव हो, छात्रों (विशेषकर महिला और दिव्यांग छात्रों) के परीक्षा केंद्र उनके गृह जिले या उसके आस-पास के 50 किलोमीटर के दायरे में ही रखे जाने चाहिए ताकि लंबी दूरी का सफर तय न करना पड़े।
- एडवांस बुकिंग और ट्रांसपोर्ट प्लानिंग: परीक्षा बोर्ड को रेलवे और राज्य परिवहन निगम (BSTC) के साथ डेटा शेयर करना चाहिए ताकि वे परीक्षार्थियों की संख्या के हिसाब से पहले से ही रूट चार्ट तैयार कर सकें।
- डिजिटल/ऑनलाइन परीक्षा मोड: यदि संभव हो, तो परीक्षाओं को कई पारियों (Shifts) में ऑनलाइन कराया जाए ताकि एक ही दिन में करोड़ों की भीड़ सड़कों और स्टेशनों पर न उमड़े।
एक झकझोर देने वाला नजारा: वायरल वीडियो में एक टीटीई (TTE) की बेबसी भी साफ दिखी, जिसे भीड़ के कारण ट्रेन से बाहर निकलने तक का रास्ता नहीं मिल पा रहा था। जब खाकी और काले कोट वाले जिम्मेदार लोग ही इस भीड़ में पिस रहे हों, तो आम छात्रों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
🚂 ट्रेनों की कमी और 'चक्का जाम' का गुस्सा
छात्रों का आरोप था कि परीक्षा के मद्देनजर रेलवे और प्रशासन द्वारा विशेष पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए थे। ट्रेनों की संख्या इतनी कम थी कि जो ट्रेनें आ रही थीं, वे पहले से ही ठसाठस भरी हुई थीं। इस अव्यवस्था से नाराज और परीक्षा छूटने के डर से बौखलाए छात्रों ने कई जगहों पर ट्रेन का चक्का जाम भी कर दिया।
पहले के दौर में छात्रों को केवल इस बात की चिंता सताती थी कि 'परीक्षा में सवाल कैसे आएंगे?' या 'पेपर कठिन होगा या आसान?'। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि छात्रों को पढ़ाई से ज्यादा इस बात की चिंता सताती है कि वे सही सलामत परीक्षा केंद्र (Exam Center) तक पहुँच भी पाएंगे या नहीं।
⚠️ हमारी राय: यह सिर्फ भीड़ नहीं, एक बड़ा चेतावनी संकेत है
AI सहयोगी की कलम से (My Opinion): यह खौफनाक मंजर सिर्फ एक परीक्षा की भीड़ नहीं है, बल्कि हमारे खोखले नजर आ रहे प्रशासनिक मैनेजमेंट और चरमराती सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का जीता-जागता प्रमाण है। जब सरकारें लाखों छात्रों के लिए एक साथ परीक्षा आयोजित करती हैं, तो वे केवल परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा गार्ड्स लगाने तक ही अपनी जिम्मेदारी क्यों सीमित कर लेती हैं? क्या उन सेंटर्स तक पहुँचने वाले रास्तों और साधनों की जिम्मेदारी उनकी नहीं है?
इस पूरे मामले को गहराई से देखें तो कुछ बेहद गंभीर चिंताएँ सामने आती हैं:
1. महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा भगवान भरोसे
इस भयंकर और अनियंत्रित भीड़ में सिर्फ पुरुष छात्र ही नहीं थे। कई महिला परीक्षार्थी और उनके साथ आए बुजुर्ग माता-पिता या अभिभावक भी थे। ऐसी अफरा-तफरी में किसी भी वक्त भगदड़ (Stampede) मच सकती थी, जिससे कोई बड़ा हादसा हो सकता था। महिलाओं के लिए इस माहौल में सफर करना किसी बुरे सपने जैसा है।
2. जान की कीमत पर रोजगार क्यों?
एक अदद अदना सी नौकरी के लिए युवाओं को मौत के कुएँ में कूदने जैसा जोखिम उठाना पड़ रहा है। पटरियों पर दौड़ना, चलती ट्रेन को पकड़ना और छतों पर बैठना किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। क्या इन युवाओं की जान की कोई कीमत नहीं है?
3. रेलवे और स्थानीय प्रशासन में तालमेल का अभाव
जब सरकार को पता होता है कि इस परीक्षा में कितने लाख फॉर्म भरे गए हैं और किस जिले के छात्र कहाँ जाने वाले हैं, तो पहले से ही स्पेशल ट्रेनें (Exam Special Trains) और अतिरिक्त बसों का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता? यह साफ तौर पर जिला प्रशासन और रेलवे विभाग के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी को दर्शाता है।
💡 आगे का रास्ता: क्या हो सकता है समाधान?
अगर भविष्य में ऐसी भयानक तस्वीरों को दोबारा देखने से बचना है, तो सिस्टम में कुछ कड़े और व्यावहारिक बदलाव करने होंगे:
📝 निष्कर्ष
बिहार पुलिस मद्य निषेध परीक्षा के दौरान जो कुछ भी पटना और पाटलिपुत्र जंक्शन पर दिखा, वह बेहद डरावना और दुखद था। युवा हमारे देश का भविष्य हैं और उनके इस जज्बे को सलाम है कि वे इतनी कठिनाइयों के बाद भी परीक्षा देने जा रहे हैं। लेकिन प्रशासन को यह समझना होगा कि युवाओं के इस सब्र और मजबूरी का इम्तिहान बार-बार नहीं लिया जाना चाहिए। उम्मीद है कि आने वाले समय में जिम्मेदार अधिकारी इस वीडियो और तस्वीरों से सबक लेंगे और भविष्य की परीक्षाओं में पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे ताकि देश का युवा पटरियों पर लटकने के बजाय सुरक्षित रहकर अपने सपनों को उड़ान दे सके।
