आजकल सोशल मीडिया खोलो तो बाबा केदारनाथ के दर्शन और वहाँ की खूबसूरत वादियों की रील्स की बाढ़ आई हुई है। बैकग्राउंड में 'नमो नमो' बज रहा होता है और नज़ारे देखकर दिल खुश हो जाता है। लेकिन भाई, कभी सोचा है कि इन शानदार रील्स और रील्स बनाने वालों को पहाड़ पर ले जाने वाले उन बेज़ुबान खच्चरों के साथ क्या होता है? आज बात करेंगे केदारनाथ यात्रा की उस कड़वी सच्चाई (Dark Reality) की, जिसे देखकर आपका दिल दहल जाएगा।
10 हजार खच्चर और सिर्फ एक मेडिकल शेल्टर!
बाबा के दरबार में हर साल 10,000 से भी ज़्यादा खच्चरों को काम पर लगाया जाता है। अब सरकारी नियम तो ये कहता है कि एक खच्चर से दिनभर में सिर्फ एक ही ट्रिप कराई जाएगी। लेकिन असली खेल यहाँ पैसों का है। ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में इनके मालिक इनसे दिन में दो-तीन या उससे भी ज़्यादा चक्कर लगवाते हैं।
हद तो तब हो जाती है जब इन बेज़ुबानों को बिना रुके लगातार चलाने के लिए नशा तक कराया जाता है। जी हाँ, सिगरेट के ज़रिए इन्हें ड्रग्स दिया जाता है ताकि ये दर्द भूलकर पहाड़ चढ़ते रहें। नतीजा? एक ही साल में 3,730 से ज़्यादा खच्चर बुरी तरह ज़ख्मी हो गए और 400 से ज़्यादा तो काम करने के लायक ही नहीं बचे।
इलाज नहीं, मरने में है ज़्यादा मुनाफ़ा!
जब इन खच्चरों की हड्डियां टूटती हैं या ये बीमार होते हैं, तो इनके मालिक इनका इलाज करवाने के बजाय इन्हें तड़प-तड़प कर मरने के लिए सड़कों या खाइयों में छोड़ देते हैं। इसके पीछे भी एक बहुत ही घटिया गणित है। दरअसल, अगर कोई खच्चर मर जाता है, तो उसके मालिक को सरकारी इंश्योरेंस की तरफ़ से तगड़ा पैसा मिलता है। यानी इन लालची लोगों के लिए जानवर का इलाज कराने से ज़्यादा फ़ायदेमंद उसे मार देना है। क्रूरता की सारी हदें यहाँ पार हो जाती हैं।
वीआईपी कल्चर: पैसे के दम पर 'शॉर्टकट'
बात सिर्फ़ जानवरों तक ही सीमित नहीं है। केदारनाथ में आम भक्तों के साथ भी जो हो रहा है, उसे देखकर खुद वहाँ के तीर्थ पुरोहितों को प्रशासन (BKTC) के खिलाफ़ मोर्चा खोलना पड़ गया।
एक तरफ़ आम आदमी, जो पूरी श्रद्धा के साथ 15-15 घंटे लंबी लाइनों में खड़ा रहता है, ठंड में ठिठुरता है। वहीं दूसरी तरफ़, बड़े कॉर्पोरेट ग्रुप्स और वीआईपी लोगों के लिए पैसे के दम पर 'फास्ट ट्रैक एंट्री' खोल दी जाती है। मतलब साफ़ है, भगवान के दर पर भी पैसों के ज़ोर पर लाइनें छोटी-बड़ी की जा रही हैं।
ये कैसी श्रद्धा?
अब सोचने वाली बात यह है कि ये कैसा 'डिवोशन' है जिसमें बेज़ुबानों के लिए कोई दया ही नहीं है? अगर हमारे दिलों में इन जीवों के लिए कोई हमदर्दी नहीं बची, तो भाई, हम खुद को श्रद्धालु कैसे कह सकते हैं? फिर तो हम सिर्फ़ और सिर्फ़ एक 'टूरिस्ट' हैं जो सिर्फ रील्स बनाने और घूमने निकले हैं।
अगली बार जब आप केदारनाथ जाएँ, तो इस कड़वे सच को ज़रूर याद रखें और इन बेज़ुबानों पर अत्याचार का हिस्सा बनने से बचें।
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