गगनचुंबी इमारतों में सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल: क्या हमारा सिस्टम बड़ी आपदाओं के लिए तैयार है?
हाल ही में नोएडा और इंदिरापुरम की हाई-राइज सोसायटियों से दिल दहला देने वाली तस्वीरें सामने आई हैं। इन बहुमंजिला इमारतों के ऊपरी फ्लोर पर लगी भीषण आग ने एक बार फिर शहरी बुनियादी ढांचे, आपातकालीन सेवाओं की तैयारियों और मुख्यधारा के मीडिया की प्राथमिकताओं पर एक बड़ा बहस छेड़ दिया है। आधुनिक लाइफस्टाइल और ऊंचे-ऊंचे फ्लैट्स का सपना दिखाने वाली ये इमारतें संकट के समय कितनी सुरक्षित हैं, यह अब एक बड़ा सवाल बन चुका है।
क्या हुआ था इन सोसायटियों में?
नोएडा के सेक्टर 74 में स्थित एक जानी-मानी अपार्टमेंट की 12वीं मंजिल पर अचानक भीषण आग लग गई। देखते ही देखते आग की लपटों ने पूरे फ्लैट को अपनी चपेट में ले लिया और खिड़कियों से काले धुएं का गुबार निकलने लगा। इसी तरह की एक और डराने वाली घटना इंदिरापुरम के एक टावर में देखने को मिली, जहाँ आग एक-दो नहीं बल्कि पूरे पांच फ्लोर तक फैल गई। दोनों ही जगहों पर मंजर बेहद भयानक था; लोग अपनी जान बचाने के लिए बालकनी में खड़े होकर मदद की गुहार लगा रहे थे।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रेस्क्यू ऑपरेशन की जमीनी हकीकत
इन घटनाओं के दौरान जो सबसे ज्यादा चिंताजनक बात सामने आई, वह थी हमारी प्रशासनिक और तकनीकी लाचारी:
- पानी के प्रेशर की भारी कमी: जब फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, तो शुरुआती दौर में उनके वॉटर जेट्स का प्रेशर इतना कम था कि पानी मुश्किल से छठी या सातवीं मंजिल तक ही पहुंच पा रहा था। 12वीं और 14वीं मंजिल पर लगी आग को बुझाने के लिए यह प्रयास पूरी तरह नाकाफी साबित हो रहे थे।
- रास्ते की बाधाएं: इंदिरापुरम में रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान यह देखा गया कि सोसायटी के पास बनी एक पार्क की बाउंड्री वॉल की वजह से फायर टेंडर्स को मुख्य टावर के करीब पहुंचने में भारी मशक्कत करनी पड़ी। इस रुकावट के कारण बेहद कीमती समय बर्बाद हो गया और आग लगातार ऊपर की तरफ बढ़ती रही।
- बड़ी मशीनों पर निर्भरता: जब छोटे फायर टेंडर्स फेल हो गए, तब जाकर प्रशासन को 42 मीटर ऊंचे हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म को तैनात करना पड़ा, जो विभाग के पास मौजूद सबसे ऊंची मशीन थी। तब कहीं जाकर 14वें फ्लोर तक पानी पहुंचाया जा सका।
संकट के समय इंसानियत की मिसाल
जहाँ एक तरफ सिस्टम बेबस नजर आ रहा था, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों और स्थानीय निवासियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर इंसानियत की एक नई मिसाल पेश की। दिल्ली और इसके आस-पास के इलाकों में ऐसी ही घटनाओं के दौरान कुछ स्थानीय दुकानदारों ने अपनी सूझबूझ दिखाई। एक गद्दा दुकान के मालिक अरमान ने बिना अपनी परवाह किए दुकान से लगभग 20-22 महंगे गद्दे सड़क पर बिछा दिए, ताकि ऊपरी मंजिलों (पहली, दूसरी और तीसरी) से लोग सुरक्षित नीचे कूद सकें। इस नेकदिली और बहादुरी की वजह से करीब 20 से 25 लोगों की जान बचाई जा सकी।
मीडिया की भूमिका और जनता का आक्रोश
इस पूरे घटनाक्रम के बाद जनता के बीच इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि मुख्यधारा के समाचार चैनल अक्सर बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाते हैं। लोगों का कहना है कि जब देश में इंफ्रास्ट्रक्चर फेलियर, फायर सेफ्टी और विकास जैसे गंभीर विषयों पर बात होनी चाहिए, तब कुछ न्यूज चैनल्स केवल डिबेट्स में हिंदू-मुसलमान और सांप्रदायिक मुद्दों को हवा देने में व्यस्त रहते हैं। जब लोगों की जान पर बन आती है, तो ये 'भाईचारे के ठेकेदार' और चिल्लाने वाले एंकर्स जमीन पर कहीं दिखाई नहीं देते।
हमारा नजरिया (Opinion):
ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी कर देना आधुनिकता की निशानी नहीं है, बल्कि संकट के समय वहां रहने वाले नागरिकों को एक सुरक्षित माहौल देना असली विकास है। जब तक बिल्डर्स और टाउन प्लानिंग अथॉरिटीज केवल मुनाफे के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता करते रहेंगे और फायर विभाग आधुनिक संसाधनों के लिए तरसता रहेगा, तब तक हम किसी भी बड़ी अनहोनी को आमंत्रित करते रहेंगे; अब समय आ गया है कि खोखली बहसों को छोड़कर सीधे जवाबदेही तय की जाए।
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