जब देश की बात आए तो 'आर्टिस्ट' और 'सुपरस्टार' क्यों बन जाते हैं गूंगे?

 

​अरे भाई, कभी सोचा है कि जिन फिल्मी सितारों और गायकों को हम अपने सिर-आँखों पर बिठाते हैं, जिनके एक डायलॉग पर तालियाँ पीटते हैं और जिनके गानों पर शादियों में जमकर थिरकते हैं, जब सच में देश के हक़ के लिए, जनता के हक़ के लिए आवाज़ उठाने का वक़्त आता है, तो इन बड़े-बड़े दिग्गजों की बोलती क्यों बंद हो जाती है? तब ये अचानक से 'पॉलिटिक्स से दूर रहने वाले शरीफ इंसान' या सिर्फ 'आर्टिस्ट' कैसे बन जाते हैं?

​आज हम बिल्कुल साफ़ और सीधी भाषा में इसी दोगलेपन का कच्चा चिट्ठा खोलेंगे। वीडियो में जो गुस्सा और जो हकीकत दिखाई गई है, वह सिर्फ एक इंसान की भड़ास नहीं है, बल्कि देश के हर उस आम नागरिक का सवाल है जो इन तथाकथित 'हीरोज' को अपना आदर्श मानता है।

​3 Idiots से करोड़ों कमाए, पर जब रीयल 'सोनम वांगचुक' भूखे बैठे तो आमिर खान गायब!

​शुरुआत करते हैं बॉलीवुड के 'मिस्टर परफेक्टनिस्ट' कहे जाने वाले आमिर खान से। फिल्म आई थी '3 Idiots', जिसमें आमिर खान ने 'फुंसुख वांगडू' का एक बेहद शानदार और प्रेरणादायक किरदार निभाया था। सब जानते हैं कि वह किरदार लद्दाख के मशहूर इंजीनियर, इनोवेटर और एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक से प्रेरित था। फिल्म सुपरहिट रही, आमिर खान ने खूब तारीफें बटोरीं और करोड़ों रुपये अपनी जेब में डाले।

  • ​पर्दे पर हीरो, असलियत में जीरो?: जब सोनम वांगचुक लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और वहाँ के अधिकारों के लिए कई दिनों तक हंगर स्ट्राइक (भूख हड़ताल) पर बैठते हैं, तो इस साढ़े पांच फुट के एक्टर के मुँह से सरकार या सिस्टम के खिलाफ एक शब्द भी नहीं निकलता।
  • ​कैसा है यह अहसान फरामोश रवैया?: जिस इंसान की जिंदगी की कहानी को भुनाकर आपने अपनी तिजोरी भरी, जब वही इंसान देश के एक हिस्से को बचाने के लिए भूखा प्यासा बैठा है, तब बॉलीवुड की यह खामोशी चुभने वाली है।

​दिलजीत दोसांझ का विदेश में स्वैग, पर देश के मुद्दों पर 'टट्टी' निकल जाती है!

​अब बात करते हैं पंजाब के चमकते सितारे और ग्लोबल आइकॉन बनने की रेस में दौड़ रहे दिलजीत दोसांझ की। विदेश में जब कोई बड़ा फैशन शो या म्यूजिक फेस्टिवल (जैसे MET Gala) होता है, तो ये भाई साहब महाराजा भूपिंदर सिंह या महाराजा रणजीत सिंह के ज़माने जैसी भारी-भरकम पोशाक पहनकर पहुँच जाते हैं। खुद को मंच से महान क्रांतिकारी भगत सिंह का सबसे बड़ा फैन बताते हैं।

  • ​"Bro, I'm an Artist, not a Politician": लेकिन जब जंतर-मंतर या देश के किसी कोने में किसी गंभीर सामाजिक मुद्दे पर या जनता के अधिकारों के लिए खड़े होने की बात आती है, तो इनका एक पुराना और घिसा-पिटा बयान सामने आ जाता है— "ब्रो, मैं तो बस एक आर्टिस्ट हूँ, मेरा राजनीति से क्या लेना-देना!"
  • ​कला को कहाँ दिखाओगे भाई?: सीधा सा सवाल है—अगर देश ही सुरक्षित नहीं रहेगा, अगर देश के लोग ही चैन से नहीं जी पाएंगे, तो भाई अपनी इस 'कला' को कहाँ ले जाओगे? क्या कोठे पर मुजरा करके दिखाओगे?

​नमक इस देश का खाते हैं, पर आवाज़ उठाने में मौत आती है!

​यह गुस्सा बिल्कुल जायज है। हमारे देश की जनता इन कलाकारों को करोड़पति और भगवान जैसा दर्जा देती है। लेकिन जब देश को इनकी आवाज़ की जरूरत होती है, तो ये ब्रांड एंडोर्समेंट और अपनी फिल्मों की रिलीज डेट बचाने में व्यस्त हो जाते हैं।

​एक कड़वा सच: इनसे बेहतर तो वो कलाकार थे जो अपनी मिट्टी से जुड़े रहे। उदाहरण के लिए, सिद्धू मूसवाला जैसे सिंगर्स ने भले ही कई विवाद झेले हों, लेकिन उन्होंने कभी अपनी जमीन, अपने लोगों और अपने हक़ की बात करने से पैर पीछे नहीं खींचे। इन बड़े स्टार्स को तो थोड़ा उनसे सीख लेनी चाहिए, शायद कुछ सीखकर इनका ज़मीर जाग जाए!


​एक्सपर्ट ओपिनियन: आखिर ये सेलिब्रिटीज बोलते क्यों नहीं हैं? (Expert Analysis)

​अब थोड़ा गहराई से समझते हैं कि आखिर इन बड़े-बड़े सेलेब्स के मुँह पर ताला क्यों लग जाता है। इसके पीछे कोई 'सादगी' नहीं बल्कि शुद्ध रूप से धंधा और डर है:

​1. ब्रांड वैल्यू और स्पॉन्सर्स का छिन जाने का डर

​आज के समय में एक-एक बड़े स्टार के पास करोड़ों रुपये की डील्स होती हैं। अगर वे किसी भी संवेदनशील या सामाजिक मुद्दे पर सरकार या सिस्टम के खिलाफ बोलते हैं, तो कंपनियाँ अपनी ब्रांड इमेज बचाने के लिए उनसे किनारा कर लेती हैं। यानी, सीधा-सीधा करोड़ों का नुकसान।

​2. सरकारी एजेंसियों और ट्रोल आर्मी का खौफ

​कोई भी सेलिब्रिटी नहीं चाहता कि उसके घर के बाहर प्रदर्शन हो, उसकी फिल्मों को बॉयकाट किया जाए, या फिर टैक्स डिपार्टमेंट की रेड पड़ जाए। वे अपनी लग्जरी लाइफस्टाइल में कोई खलल नहीं चाहते, इसलिए 'न्यूट्रल' या 'गूंगे' बने रहना ही सबसे सेफ रास्ता समझते हैं।

​3. जनता का अंधभक्त होना भी एक वजह है

​हम लोग भी तो कम नहीं हैं! हम इनके दोगलेपन को देखकर भी इनकी अगली फिल्म की टिकट लाइन में लगकर खरीदते हैं। जब तक जनता इन सितारों को जवाबदेह नहीं बनाएगी और इनकी रीढ़विहीन (spineless) हरकतों पर सवाल नहीं उठाएगी, तब तक ये ऐसे ही सिर्फ पैसों के लिए काम करते रहेंगे।

​निष्कर्ष: अब जागने की बारी हमारी है!

​लब्बोलुआब यह है कि सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाला हर 'रॉबिनहुड' या 'देशभक्त' असल जिंदगी में भी वैसा ही हो, यह जरूरी नहीं। असली हीरो वो हैं जो लद्दाख की कड़कड़ाती ठंड में देश के भविष्य के लिए भूखे बैठे हैं (जैसे सोनम वांगचुक), न कि वो जो एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर 'आर्टिस्ट' होने का ढोंग रचते हैं।

​हमें यह समझना होगा कि जो कलाकार सिर्फ आपके पैसों से प्यार करते हैं, लेकिन आपके हक़ की लड़ाई में आपके साथ खड़े नहीं हो सकते, वे कभी भी आपके रोल मॉडल नहीं होने चाहिए। अगली बार जब आप किसी स्टार के फैन बनें, तो यह जरूर देख लें कि क्या उसमें देश के लिए बोलने का दम है या वह भी सिर्फ एक 'दोगला' बिजनेसमैन है!


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