आज के दौर में राजनीति सिर्फ नीतियों और वादों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह ब्रांडिंग और तस्वीरों का खेल बन चुकी है। सोशल मीडिया पर हाल ही में एक वीडियो तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें 'कांग्रेस जनता पार्टी' (CJP) के फाउंडर अभिजीत दिपके के एक बयान का जिक्र किया गया है। इस वीडियो में सरकारी योजनाओं पर देश के प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाने की नीति पर तीखा तंज कसा गया है।
बयान में कहा गया है कि जब देश में हर छोटी-बड़ी सरकारी चीज पर प्रधानमंत्री की तस्वीर दिखाई देती है, तो फिर उन जगहों पर जिम्मेदारी क्यों नहीं तय की जाती जहाँ हमारा सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाता है? आइए इस पूरे मुद्दे को गहराई से समझते हैं और देखते हैं कि इसके पीछे की राजनीति और हकीकत क्या है।
वीडियो का मुख्य मुद्दा: हर जगह तस्वीर, तो जिम्मेदारी कहाँ?
वीडियो में बेहद सीधे और कड़े शब्दों में एक सवाल उठाया गया है। बयान के मुताबिक:
- राशन कार्ड पर तस्वीर: गरीबों को मिलने वाले सरकारी राशन के कार्ड पर देश के प्रधान की फोटो छपी होती है।
- वैक्सीन सर्टिफिकेट पर तस्वीर: कोरोना काल में जब लोगों को वैक्सीन लगी, तो उसके डिजिटल और फिजिकल सर्टिफिकेट पर भी तस्वीर अनिवार्य रूप से लगाई गई।
- पेट्रोल पंप्स पर होर्डिंग्स: देश के किसी भी कोने में पेट्रोल पंप पर चले जाइए, वहाँ बड़े-बड़े विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर सरकार और प्रधानमंत्री का चेहरा चमकता हुआ दिखता है।
वीडियो में इसी बात को आधार बनाकर एक बेहद गंभीर और झकझोर देने वाला तंज कसा गया है। कहा गया है कि:
"अगर हर एक लोक-कल्याणकारी योजना और सरकारी सेवा का श्रेय लेने के लिए चेहरे का इस्तेमाल किया जाता है, तो फिर उन छात्रों और युवाओं के डेथ सर्टिफिकेट (मृत्यु प्रमाण पत्र) पर भी वही तस्वीर होनी चाहिए, जिन्होंने इस देश के जर्जर और नाकाम सिस्टम (System Failure) की वजह से अपनी जान गँवा दी।"
यह बयान सीधे तौर पर सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है कि जब वाहवाही लूटने के लिए चेहरा आगे किया जाता है, तो नाकामियों के वक्त जिम्मेदारी से पल्ला क्यों झाड़ लिया जाता है?
सिस्टम के फेलियर और युवाओं का दर्द (एक कड़वी सच्चाई)
अगर हम इस बयान के पीछे छुपे दर्द को देखें, तो यह हमारे देश के युवाओं, खासकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की मौजूदा स्थिति को बयां करता है। पिछले कुछ समय में हमने ऐसी कई घटनाएँ देखी हैं जो रूह कँपा देती हैं:
1. परीक्षाओं के पेपर लीक और मानसिक तनाव
सालों-साल दिन-रात एक करके तैयारी करने वाले छात्रों के हाथ में जब आखिरी वक्त पर पेपर लीक होने की खबर आती है, तो उनका भविष्य धुंधला हो जाता है। ऐसी स्थिति में कई युवा डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं और आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
2. बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) की कमी
देश के बड़े-बड़े कोचिंग हब्स (जैसे दिल्ली का ओल्ड राजेंद्र नगर या मुखर्जी नगर) में बेसमेंट में चलने वाली लाइब्रेरी में पानी भर जाने या शॉर्ट सर्किट होने से मासूम छात्रों की मौतें हुई हैं। क्या यह सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम का फेलियर नहीं है?
3. बेरोजगारी का दबाव
डिग्रियों के अंबार के बाद भी जब युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तो समाज और परिवार का दबाव उन्हें अंदर से तोड़ देता है।
जब इन नाकामियों की बात आती है, तो प्रशासन अक्सर इसे 'हादसा' कहकर या निचली कतार के अधिकारियों को सस्पेंड करके पल्ला झाड़ लेता है। इसी दोहरे रवैये पर इस वीडियो में तीखा प्रहार किया गया है।
एक्सपर्ट ओपिनियन: क्या कहते हैं राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक?
इस पूरे 'फोटो पॉलिटिक्स' और जवाबदेही के मुद्दे पर जब हम समाजशास्त्रियों और राजनीतिक एक्सपर्ट्स की राय देखते हैं, तो कुछ बेहद महत्वपूर्ण पहलू सामने आते हैं:
'पर्सनालिटी कल्ट' (Personality Cult) की राजनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक लोकतंत्र में अब पार्टियों से ज्यादा 'व्यक्तियों' को ब्रांड बनाने की होड़ लगी है। जब किसी एक चेहरे को पूरी सरकार का पर्याय बना दिया जाता है, तो जनता के मन में यह छवि बनती है कि सब कुछ वही एक व्यक्ति कर रहा है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा जोखिम भी जुड़ा है—अगर सब कुछ एक ही व्यक्ति की वजह से हो रहा है, तो सिस्टम की हर खराबी के लिए भी उंगली उसी पर उठेगी।
जनता का पैसा, सरकार का प्रचार?
कानूनी और प्रशासनिक जानकारों का तर्क है कि राशन, वैक्सीन या पेट्रोल पर मिलने वाली कोई भी सब्सिडी सरकार अपनी जेब से नहीं बल्कि टैक्सपेयर्स (जनता) के पैसे से देती है। इसलिए, इन सेवाओं को किसी 'व्यक्तिगत अहसान' या 'गिफ्ट' की तरह पेश करना और उस पर बड़े-बड़े विज्ञापन लगाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
क्रेडिबिलिटी (विश्वसनीयता) का संकट
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जब सरकारें प्रचार में करोड़ों रुपये खर्च करती हैं और जमीनी स्तर पर युवा बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते हैं, तो सरकार की विश्वसनीयता कम होने लगती है। जनता अब सिर्फ विज्ञापनों को देखकर प्रभावित नहीं होती, वह अपने आस-पास का माहौल और रोजगार के अवसर भी देखती है।
विज्ञापन बनाम जवाबदेही: संतुलन कहाँ है?
किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार का यह कर्तव्य है कि वह अपनी योजनाओं की जानकारी आम जनता तक पहुँचाए। इसके लिए विज्ञापनों का सहारा लेना गलत नहीं है। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब:
- प्रचार, काम से बड़ा हो जाए: जब योजनाओं को लागू करने से ज्यादा बजट उनके विज्ञापनों और फोटो छपवाने में खर्च होने लगे।
- जिम्मेदारी तय न हो: जब कोई पुल गिरता है, पेपर लीक होता है या किसी हादसे में मासूमों की जान जाती है, तब कोई भी नेता या बड़ा अधिकारी उस नाकामी का 'चेहरा' बनने को तैयार नहीं होता।
निष्कर्ष: बदलाव की जरूरत
वीडियो में उठाया गया मुद्दा भले ही एक राजनीतिक तंज हो, लेकिन यह हमारे समाज और सिस्टम के एक बहुत बड़े सच को उजागर करता है। देश के युवाओं को बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स पर छपी तस्वीरों से ज्यादा एक सुरक्षित माहौल, निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और रोजगार के अवसरों की जरूरत है।
अगर सरकारें हर अच्छी चीज का क्रेडिट लेने के लिए आगे आती हैं, तो उन्हें सिस्टम की कमियों और उससे होने वाले नुकसानों की जिम्मेदारी भी उतनी ही मुस्तैदी से लेनी होगी। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे सवाल उठते रहेंगे और लोकतंत्र में जनता का भरोसा डगमगाता रहेगा। बदलाव तभी आएगा जब प्रचार से ज्यादा ध्यान परफॉर्मेंस और जनता की सुरक्षा पर दिया जाएगा।
