यूरोप बना 'नया इंडिया'! 40 डिग्री की गर्मी से पिघल रही हैं सड़कें, जानिए क्यों बेहाल है गोरे लोगों का देश

 


जब भारत में पारा 40 या 45 डिग्री सेल्सियस पहुंचता है, तो दिल्ली, उत्तर प्रदेश या राजस्थान के लोगों के लिए यह एक आम बात होती है। हम लोग कूलर की घास बदलते हैं, गन्ने का जूस पीते हैं और अपने काम पर निकल जाते हैं। लेकिन सोचिए, अगर यही तापमान यूरोप में हो जाए तो क्या होगा? आज यूरोप का हाल कुछ ऐसा ही है कि वहां के लोग कह रहे हैं—"यूरोप अब नया इंडिया बन गया है!"

​यूरोप इस समय इतिहास की सबसे भयानक और जानलेवा हीटवेव (लू) का सामना कर रहा है। जहां का तापमान कभी 20 से 25 डिग्री के आसपास रहता था, वहां अब पारा 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है। इस भीषण गर्मी ने वहां के जनजीवन को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर यूरोप में इस वक्त क्या चल रहा है और एक्सपर्ट्स का इस पर क्या कहना है।

​यूरोप में मची है त्राहि-त्राहि: आंकड़े उड़ा देंगे होश

​यूरोप में गर्मी का आलम यह है कि लोग अब इसे एक प्राकृतिक आपदा की तरह देख रहे हैं। इस जानलेवा हीटवेव की वजह से अब तक 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। फ्रांस जैसे ठंडे देश में आधी से ज्यादा आबादी को 'रेड अलर्ट' पर रखा गया है।

​वहां की स्थिति का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं:

  • पिघलती हुई सड़कें और बुनियादी ढांचा: सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं जहां सड़कें पिघल रही हैं। यही नहीं, सड़कों पर लगे ट्रैफिक सिग्नल (साइन बोर्ड्स) गर्मी के कारण पिघलकर लटक गए हैं।
  • रेलवे ट्रैक का बुरा हाल: ट्रेन की पटरियां गर्मी से फैल रही हैं, जिसके कारण कई जगहों पर ट्रेनों को बीच रास्ते में ही रोकना पड़ा ताकि यात्रियों को ताजी हवा मिल सके और कोई बड़ा हादसा न हो।
  • राहत के लिए पानी का छिड़काव: शहरों की मुख्य सड़कों पर दिन-दहाड़े पानी का स्प्रे (वाटर मिस्ट) किया जा रहा है ताकि हवा को थोड़ा ठंडा किया जा सके।

​स्कूल-कॉलेज बंद और नदियों में उमड़ी भीड़

​इस भीषण गर्मी के कारण यूरोप के कई देशों में स्कूल, कॉलेज और जरूरी बिजनेस मीटिंग्स तक को कैंसिल करना पड़ा है। लोग गर्मी से बचने के लिए स्विमिंग पूल, नदियों और तालाबों की तरफ भाग रहे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि बिना तैयारी के अचानक पानी में कूदने और लापरवाही के कारण 40 से ज्यादा लोगों की डूबने से मौत की खबर भी रिपोर्ट की गई है।

​वहां के लोग 35 से 37 डिग्री सेल्सियस तापमान में ही पूरी तरह से बेहाल हो चुके हैं, जबकि भारत में इस तापमान को एक बेहद सुहाना और अच्छा मौसम माना जाता है।

​आखिर क्यों 40 डिग्री में ही घुटने टेक रहा है यूरोप? (एक्सपर्ट ओपिनियन)

​अब आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि भारत में तो लोग 48 डिग्री में भी जी लेते हैं, तो फिर यूरोप वाले 40 डिग्री में क्यों मर रहे हैं? इसके पीछे कुछ बहुत ही ठोस वैज्ञानिक और बुनियादी कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है:

​1. घरों की बनावट (Infrastructure Limitation)

​यूरोप के घर सदियों से ठंड को झेलने के लिए बनाए गए हैं। वहां के घरों की दीवारें मोटी होती हैं और उन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि सूरज की गर्मी घर के अंदर ही लॉक रहे (Heat Insulation)। अब जब बाहर का तापमान 40 डिग्री हो गया है, तो ये घर तंदूर की तरह तप रहे हैं।

​2. एसी (Air Conditioning) की कमी

​भारत में मिडिल क्लास और अपर क्लास के घरों में एसी या कूलर होना आम बात है। लेकिन यूरोप में अमूमन इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती थी। वहां के केवल 5% से 10% घरों में ही एयर कंडीशनर लगे हैं। अचानक आई इस गर्मी के कारण बाजारों में एसी और पंखों की किल्लत हो गई है, लोग इन्हें खरीदने के लिए पागलों की तरह दुकानों पर लाइन लगा रहे हैं।

​3. शरीर की आदत (Acclimatization)

​मानव शरीर को एक निश्चित माहौल में रहने की आदत होती है। भारतीयों का शरीर पीढ़ियों से तेज धूप और गर्मी को सहने के लिए अनुकूलित (Adapt) हो चुका है। इसके विपरीत, यूरोपीय लोगों का शरीर इतनी तीव्र यूवी किरणों (UV Rays) और उमस को बर्दाश्त नहीं कर पाता, जिससे उन्हें बहुत जल्दी हीट स्ट्रोक (लू लगना) और डिहाइड्रेशन हो जाता है।

​क्या होता है 'हीट डोम' (Heat Dome)?

​वीडियो में वैज्ञानिकों के हवाले से एक बहुत ही जरूरी शब्द का इस्तेमाल किया गया है—'हीट डोम'। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यूरोप की इस हालत के पीछे 'हीट डोम' का बहुत बड़ा हाथ है।

आसान भाषा में समझें: जब वायुमंडल में हाई प्रेशर (उच्च दबाव) का क्षेत्र बनता है, तो वह गर्म हवा को एक जगह पर दबा देता है। यह ठीक वैसे ही काम करता है जैसे किसी बर्तन पर ढक्कन ढक दिया जाए। इसके कारण गर्म हवा ऊपर नहीं उठ पाती और उसी इलाके में फंसकर और ज्यादा गर्म होती जाती है। यही हीट डोम इस वक्त पूरे यूरोप को एक उबलते हुए तंदूर में बदल रहा है।


​जलवायु परिवर्तन (Climate Change): झांसा या हकीकत?

​इस पूरे संकट के बीच राजनीति भी गरमाई हुई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे कई बड़े नेता अक्सर यह बयान देते रहे हैं कि "क्लाइमेट चेंज सिर्फ एक झांसा (Con Job) है।" लेकिन जमीन पर दिख रही हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

​पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि अगर दुनिया ने अब भी कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) को कम नहीं किया, तो आने वाले सालों में यह स्थिति और भी बदतर होने वाली है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह से बिगड़ चुका है। जो देश कल तक बर्फ की चादर ओढ़े रहते थे, आज वहां की पटरियां पिघल रही हैं।

​निष्कर्ष: हमारे लिए क्या है सबक?

​यूरोप की यह हालत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि प्रकृति के सामने इंसान और उसकी तकनीक कितनी बेबस है। आज यूरोप जिस संकट से गुजर रहा है, वह पूरी दुनिया के लिए एक कड़ा सबक है। पेड़-पौधों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के जंगलों का निर्माण ही इस 'शहरी हीट आइलैंड' (Urban Heat Island) को जनम दे रहा है। अगर हम आज नहीं संभले, तो आने वाले समय में धरती का कोई भी कोना रहने लायक नहीं बचेगा। यूरोप का यह मंजर कोई आम गर्मी नहीं, बल्कि धरती मां की तरफ से दी जा रही एक गंभीर चेतावनी है।

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