हमारे देश में अजीबो-गरीब किस्सों की कोई कमी नहीं है, लेकिन हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने कानून व्यवस्था और जनता दोनों को हैरान कर दिया है। सोशल मीडिया और न्यूज़ गलियारों में आजकल एक ही बात की चर्चा है—"क्या हमारे देश के चूहे अब गांजा और ड्रग्स के नशेड़ी हो चुके हैं?" यह सुनने में भले ही एक मज़ाक या किसी फिल्मी कॉमेडी का सीन लगे, लेकिन इसके पीछे का सच बेहद गंभीर है, जो सीधे तौर पर हमारे देश की पुलिस प्रणाली और उनकी जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है।
सीएजी (CAG) की रिपोर्ट और गुजरात पुलिस का 'चूहा कांड'
इस पूरे विवाद की शुरुआत होती है नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी CAG (Comptroller and Auditor General) की एक लेटेस्ट रिपोर्ट से। गुजरात विधानसभा में पेश की गई इस ऑडिट रिपोर्ट में एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ जिसने सबके होश उड़ा दिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2022 से जुलाई 2023 के बीच गुजरात पुलिस ने अलग-अलग कार्रवाइयों में लगभग 6,510.54 किलोग्राम नशीले पदार्थ (ड्रग्स) जब्त किए थे। नियम के अनुसार, जब्त किए गए इन खतरनाक ड्रग्स को कानूनी प्रक्रिया के तहत नष्ट करना होता है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इसमें से 4,177.86 किलोग्राम ड्रग्स को तो रोलर चलाकर या जलाकर नष्ट (Destroy) कर दिया गया।
बड़ा सवाल: लेकिन खेल यहाँ से शुरू होता है। कुल जब्त किए गए माल में से लगभग 2,332.68 किलोग्राम (करीब ढाई हजार किलो) ड्रग्स का कोई अता-पता नहीं चला। यह भारी-भरकम स्टॉक पुलिस कस्टडी और उनके मालखाने से अचानक गायब हो गया।
जब कोर्ट और जांच एजेंसियों ने गुजरात पुलिस से कड़ाई से पूछा कि भाई, यह ढाई हजार किलो गांजा और नशीला पदार्थ आख़िर गया कहाँ? तो पुलिस की तरफ से जो जवाब आया, उसने सबको सिर पकड़ने पर मजबूर कर दिया। पुलिस का सीधा और सादा बहाना था—"साहब, इस ड्रग्स को मालखाने के चूहे खा गए!"
क्या सिर्फ गुजरात के चूहे ही 'नशेड़ी' हैं?
अगर आपको लगता है कि यह घटना सिर्फ गुजरात तक सीमित है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। ऐसा लगता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के चूहों को अनाज से ज़्यादा नशीले पदार्थों का स्वाद भाने लगा है। इतिहास गवाह है कि जब-जब पुलिस से मालखाने में रखे माल का हिसाब मांगा गया है, तब-तब चूहों को ही बलि का बकरा बनाया गया है।
- उत्तर प्रदेश (UP): यूपी में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था जहाँ कोर्ट में पुलिस ने लिखित दलील दी कि चूहों ने थाने में रखी भारी मात्रा में गांजे की खेप को बर्बाद और खा लिया है। कोर्ट के जज संजय चौधरी ने भी इस पर सख्त टिप्पणी की थी कि चूहों जैसे छोटे जीवों से ड्रग्स को बचाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
- झारखंड: झारखंड से भी ऐसी ही खबरें आईं जहाँ पुलिस ने कोर्ट को बताया कि लगभग 200 किलो गांजा जो किसी केस का मुख्य सबूत था, उसे चूहे चट कर गए।
- चेन्नई: दक्षिण भारत के चेन्नई में भी साल 2020 में पुलिस स्टोर से 22 किलो गांजा गायब होने का आरोप चूहों पर मढ़ दिया गया। मज़ेदार बात यह रही कि सबूत (गांजा) गायब होने की वजह से कोर्ट को दोनों आरोपियों को रिहा करना पड़ा।
चूहों पर इल्जाम: हकीकत या भ्रष्टाचार का पर्दा?
एक आम इंसान भी यह समझ सकता है कि ढाई हजार किलो या 200 किलो गांजा कोई मामूली मात्रा नहीं होती। चूहों का शरीर बेहद छोटा होता है। अगर वे कुछ ग्राम नशीला पदार्थ भी खा लें, तो ओवरडोज़ की वजह से उनकी मौत होना निश्चित है। लेकिन कमाल की बात यह है कि पुलिस कस्टडी के ये चूहे न तो कभी मरते हैं और न ही कभी बीमार पड़ते हैं। वे हज़ारों किलो गांजा खाकर गायब हो जाते हैं!
वास्तविकता यह है कि "चूहे खा गए" का बहाना सिर्फ एक कानूनी ढाल है, जिसका इस्तेमाल कुछ भ्रष्ट अधिकारी अपनी कमियों और अवैध हरकतों को छिपाने के लिए करते हैं। सच्चाई यह है कि यह जब्त किया गया ड्रग्स पुलिस कस्टडी से चोरी-छिपे वापस उसी काले बाज़ार (Black Market) में बेच दिया जाता है जहाँ से इसे पकड़ा गया था। यह ड्रग्स तस्करों और भ्रष्ट सिस्टम के बीच की मिलीभगत का एक जीता-जागता उदाहरण है।
हमारा नज़रिया और ओपिनियन (Our Opinion)
अब बात करते हैं इसके असली और कड़वे सच की। यह बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है कि जिस पुलिस पर समाज को नशा-मुक्त बनाने की ज़िम्मेदारी है, उसी के महकमे के कुछ लोग चंद पैसों के लालच में इस ज़हर को दोबारा समाज में फैला रहे हैं। कानून की भाषा में इसे 'क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट' यानी जनता के भरोसे का कत्ल कहा जाना चाहिए।
मेरा मानना है कि जब तक हम थानों और पुलिस मालखानों में CCTV कैमरों की अनिवार्य निगरानी, डिजिटल लॉकिंग सिस्टम और थर्ड-पार्टी ऑडिट जैसी व्यवस्था लागू नहीं करेंगे, तब तक ये 'कागज़ी चूहे' इसी तरह देश के कानून और सबूतों को कुतरते रहेंगे। अगर आज हम चूहों के नाम पर हज़ारों किलो ड्रग्स का गायब होना बर्दाश्त कर रहे हैं, तो कल को पुलिस यह भी कह सकती है कि तिजोरी में रखे ज़ब्त किए गए सोने के बिस्कुट और करोड़ों रुपये भी चूहे चबा गए!
यह सीधे तौर पर सिस्टम की नाकामी और जवाबदेही से भागने का तरीका है। सरकार और सुप्रीम कोर्ट को इस पर सख्त से सख्त कदम उठाना चाहिए ताकि देश की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था का मज़ाक न बने।
आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या वाकई आपको लगता है कि चूहे गांजा फूंक रहे हैं, या फिर असली 'चूहे' वर्दी के पीछे छिपे बैठे हैं? इस वीडियो और आर्टिकल को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि सिस्टम तक यह आवाज़ पहुँचे।
