मासूमियत पर भारी पड़ा वक़्त का थपेड़ा: 7 साल के बच्चे की वो दास्तान जो हर आँख नम कर दे


 

कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं, और उनका बचपन खेल-कूद, शरारतों और माँ-बाप के साए में बीतना चाहिए। लेकिन कभी-कभी वक़्त और किस्मत का चक्र ऐसा घूमता है कि इंसान के पास सिवाय आंसू बहाने के कुछ नहीं बचता। सोशल मीडिया पर हाल ही में सामने आया एक वीडियो दिल को इस कदर झकझोर देता है कि इंसानियत पर से भी कभी-कभी भरोसा डगमगाने लगता है। यह कहानी है एक महज़ 7 साल के मासूम बच्चे की, जिसके कंधों पर इस छोटी सी उम्र में दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है जिसे उठाने की उसकी उम्र और समझ, दोनों ही अभी बहुत छोटी थीं।

​जब छिन गया माँ-बाप का साया

​इस मासूम की दुनिया उस दिन पूरी तरह से उजड़ गई, जब इसके सिर से माँ और बाप, दोनों का साया हमेशा-हमेशा के लिए उठ गया। ज़रा सोचिए, एक 7 साल का बच्चा जिसे यह भी ठीक से नहीं पता होता कि मौत क्या होती है, वह अचानक खुद को इस मतलबी दुनिया में बिल्कुल अकेला पाता है। न तो कोई अपना आगे आया और न ही किसी रिश्तेदार ने उस बच्चे की ज़िम्मेदारी लेने की ज़हमत उठाई। लोग अक्सर सुख के दिनों में तो अपनी रिश्तेदारी और भाईचारे की दुहाई देते हैं, लेकिन जब किसी मासूम पर मुसीबत का वक़्त आया, तो सबने अपने कदम पीछे खींच लिए।

​वह बच्चा अपनों की राह देखता रहा। घंटो नहीं, बल्कि पूरा एक दिन यानी कि पूरे 24 घंटे वह मासूम अकेला खड़ा रहा। उसकी आँखों में ढेरों सवाल थे, दिल में एक अनजाना सा डर था, लेकिन उस डर को दूर करने वाला और उसकी आँखों के आंसुओं को पोंछने वाला वहाँ कोई नहीं था। क्या हमारी सामाजिक व्यवस्था और रिश्तों के मायने इतने खोखले हो चुके हैं कि हम एक अनाथ बच्चे को 24 घंटे तक बेसहारा छोड़ सकते हैं?

​कंधों पर आया अंतिम संस्कार का बोझ

​"जिस उम्र में हाथों में खिलौने होने चाहिए थे, उस उम्र में उस मासूम को अपनी माँ की अंतिम विदाई का साक्षी बनना पड़ा।"


​वीडियो में आगे जो कुछ भी दिखता है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान के कलेजे को चीर कर रख दे। उस 7 साल के बच्चे ने अपनी माँ को अंतिम विदाई दी। जब सगे-संबंधी और समाज मूकदर्शक बना बैठा था, तब कुछ हिंदू संगठनों के लोग आगे आए। उन्होंने इंसानियत का फर्ज निभाया और उस बच्चे का साथ देकर उसकी माँ के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई। यह दृश्य देखकर हर किसी की आँखें नम होना लाज़मी है। चिता की उठती लपटें सिर्फ एक माँ के शरीर को नहीं जला रही थीं, बल्कि उस मासूम के बचपन और उसकी खुशियों को भी राख में तब्दील कर रही थीं।

​हमारा नज़रिया: कहाँ खड़ी है आज की इंसानियत?



​जब बचपन ही एक बोझ बन जाए, तो फिर यह समाज और इसके खोखले नियम-कायदे कहाँ जाकर खड़े होते हैं? यह घटना हमारे पूरे समाज के चेहरे पर एक करारा तमाचा है। हम खुद को आधुनिक और प्रगतिशील कहते हैं, लेकिन अगर हम अपने आस-पास के किसी बेसहारा बच्चे की चीख नहीं सुन सकते, तो हमारी यह तरक्की सिर्फ एक दिखावा है।

हमारी सोच: * रिश्तों की संवेदनहीनता: इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में खून के रिश्ते भी कई बार सिर्फ नाम के रह जाते हैं। जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब रिश्तेदारों का गायब होना बेहद शर्मनाक है।

  • इंसानियत की मिसाल: भले ही अपनों ने मुंह मोड़ लिया, लेकिन कुछ अनजान लोगों (हिंदू संगठन के सदस्यों) ने आगे आकर यह जताया कि इंसानियत अभी पूरी तरह मरी नहीं है। दुनिया आज भी ऐसे ही भले लोगों की बदौलत चल रही है।
  • बाल अधिकारों और सुरक्षा पर सवाल: ऐसे बच्चों के लिए सरकारी और सामाजिक स्तर पर एक मज़बूत सुरक्षा चक्र होना चाहिए ताकि किसी भी बच्चे को 24 घंटे तक इस तरह अकेले और खौफ के साए में न रहना पड़े।

​निष्कर्ष और सीख

"वक़्त से पहले और किस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिलता," यह कहावत पुरानी है, लेकिन इस बच्चे के मामले में वक़्त ने उसे उम्र से बहुत पहले बड़ा और समझदार बनने पर मजबूर कर दिया। इस उम्र में मिला यह गहरा सदमा उसके दिलो-दिमाग पर क्या असर डालेगा, इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।

​आज ज़रूरत इस बात की है कि हम सिर्फ इस वीडियो को देखकर अफ़सोस न जताएं, बल्कि अपने आस-पास भी नज़र रखें। अगर हमारे समाज में, हमारे पड़ोस में कोई ऐसा बच्चा या मज़बूर इंसान है, तो उसकी तरफ मदद का हाथ ज़रूर बढ़ाएं। क्योंकि सरकारें और कानून अपनी जगह काम करते रहेंगे, लेकिन समाज को मज़बूत और संवेदनशील बनाए रखना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। भगवान इस मासूम बच्चे को इस गहरे दुःख को सहने की शक्ति दे और उसे एक सुरक्षित और बेहतर भविष्य मिले।


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