आखिरी ख्वाहिश में ऑर्केस्ट्रा डांस: क्या है इस वायरल वीडियो का सच और इसके पीछे की भावना?

 

सोशल मीडिया पर आए दिन न जाने कितने वीडियो वायरल होते हैं। कुछ हमें हंसाते हैं, कुछ गुदगुदाते हैं, तो कुछ ऐसी सीख दे जाते हैं जो सीधे दिल को छू लेती है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से बिहार का एक ऐसा वीडियो इंटरनेट पर तहलका मचा रहा है, जिसने लोगों को हैरान भी किया है और भावुक भी।

​यह वीडियो एक ऐसे नौजवान का है, जो जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है, लेकिन उसकी आखिरी ख्वाहिश ने सोशल मीडिया की दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। आइए जानते हैं कि आखिर इस वीडियो में ऐसा क्या है जो हर कोई इसके बारे में बात कर रहा है।

​क्या है वायरल वीडियो की पूरी कहानी?

​वायरल हो रहे वीडियो के मुताबिक, यह मामला बिहार का बताया जा रहा है। यहाँ कैंसर की अंतिम स्टेज (Stage 4 Cancer) से जूझ रहे एक युवक की आखिरी इच्छा को पूरा करने के लिए उसके परिवार ने कुछ ऐसा किया, जिसकी कल्पना शायद ही कोई आम इंसान कर सके।

  • अंतिम स्टेज का कैंसर: युवक अस्पताल के बिस्तर या कहें कि अपने घर पर गंभीर हालत में लेटा हुआ है। डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं और उसकी जिंदगी के कुछ ही दिन बचे हैं।
  • अनोखी आखिरी ख्वाहिश: जब घरवालों ने युवक से उसकी आखिरी इच्छा पूछी, तो उसने कहा कि वह अपनी मौत से पहले ऑर्केस्ट्रा (Orchestra) और डांसर्स का डांस देखना चाहता है।
  • परिवार का फैसला: अमूमन ऐसे माहौल में लोग पूजा-पाठ या भजन-कीर्तन करवाते हैं, लेकिन इस परिवार ने युवक की खुशी को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने युवक के कमरे या आँगन में ही बाकायदा स्टेज जैसा माहौल बनाया और डांसर्स को बुलाकर ऑर्केस्ट्रा का आयोजन कर दिया।

​वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि युवक बिस्तर पर बेसुध सा लेटा है, उसके आसपास भारी भीड़ जमा है और सामने डांसर्स नाच रही हैं। लोग उस पर पैसे भी वार रहे हैं। यह नजारा जितना हैरान करने वाला है, उतना ही दिल को झकझोर देने वाला भी है।

​लोगों की प्रतिक्रिया: इंटरनेट पर छिड़ी बहस

​इस वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स दो गुटों में बंट गए हैं। हर किसी का इस अनोखे आयोजन को देखने का अपना एक नजरिया है:

​१. भावना का सम्मान करने वाले लोग

​एक वर्ग का मानना है कि परिवार ने जो किया, वह बहुत हिम्मत का काम था। जब इंसान को पता हो कि उसका अपना अब कुछ ही दिनों का मेहमान है, तो उसकी हर इच्छा, चाहे वह कितनी भी अजीब क्यों न हो, पूरी करना ही सबसे बड़ा धर्म बन जाता है। इन लोगों का कहना है कि मरते हुए इंसान के चेहरे पर आखिरी पल में खुशी लाना ही सबसे पुण्य का काम है।

​२. परंपरा और संस्कृति की दुहाई देने वाले लोग

​दूसरी तरफ, कुछ लोग इस बात से नाराज और हैरान हैं। उनका कहना है कि हमारे समाज में जीवन के अंतिम क्षणों में भगवान का नाम लिया जाता है, भजन-कीर्तन सुने जाते हैं ताकि आत्मा को शांति मिले। ऐसे गंभीर और दुखद माहौल में नाच-गाना और ऑर्केस्ट्रा कराना भारतीय संस्कृति और मर्यादा के खिलाफ है।

​एक्सपर्ट ओपिनियन: 'लास्ट विश' (Last Wish) और मानसिक स्थिति पर जानकारों का क्या कहना है?

​इस तरह के मामलों पर जब हमने मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) और पारिवारिक एक्सपर्ट्स की राय जानी, तो कुछ बहुत ही दिलचस्प बातें सामने आईं।

"इंसान की आखिरी इच्छा उसके जीवन के अनकहे अरमानों का हिस्सा होती है। जब किसी को पता चलता है कि उसका समय सीमित है, तो उसका दिमाग सामाजिक बंधनों और नियमों से परे सोचना शुरू कर देता है। उसे सिर्फ वही चीज चाहिए होती है जो उसे तात्कालिक आनंद या सुकून दे सके।"


​विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों को सही या गलत के तराजू में नहीं तोला जा सकता। इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक पहलू होते हैं:

  • पैलिएटिव केयर (Palliative Care) का सिद्धांत: मेडिकल साइंस में भी जब किसी बीमारी का इलाज मुमकिन नहीं होता, तो मरीज को 'पैलिएटिव केयर' दी जाती है। इसका सीधा मतलब होता है मरीज के आखिरी दिनों को जितना हो सके दर्द रहित और खुशनुमा बनाना। अगर मरीज को किसी चीज से खुशी मिल रही है, तो डॉक्टर भी उसे रोकने की सलाह नहीं देते।
  • परिवार का मानसिक दबाव: ऐसे वक्त में परिवार बहुत बड़े मानसिक सदमे से गुजर रहा होता है। वे अपने बच्चे या भाई को खोने के गम में इस कदर डूबे होते हैं कि वे उसे किसी भी कीमत पर खुश देखना चाहते हैं। उनके लिए समाज क्या कहेगा, इससे बड़ा यह होता है कि उनका बच्चा हंसते हुए दुनिया से विदा हो।

​एक बड़ा सवाल: क्या यह वाकई सही है? (हमारा नजरिया)

​अगर हम इस पूरी घटना को निष्पक्ष होकर देखें, तो इसके दोनों पहलू अपनी-अपनी जगह मजबूत नजर आते हैं।

सकारात्मक पक्षनकारात्मक पक्ष

मरीज की खुशीमरते हुए इंसान की इच्छा पूरी हुई, उसे मानसिक सुकून मिला।माहौल की गंभीरता और गरिमा कम हो जाती है।

पारिवारिक संतोषपरिवार को तसल्ली रहेगी कि उन्होंने अपने बच्चे को रोते हुए नहीं, खुश देखा।समाज में एक ऐसा ट्रेंड सेट हो सकता है जो शायद सबको स्वीकार्य न हो

बिहार के इस वीडियो ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि "जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी और खुशनुमा होनी चाहिए।" भले ही वह खुशी किसी भी रूप में आए। रूढ़िवादी सोच से हटकर देखें तो उस लाचार युवक के लिए वह पल उसकी जिंदगी का सबसे हसीन पल रहा होगा।

निष्कर्ष

आखिर में बात घूम-फिर कर वहीं आती है कि हर परिवार और हर इंसान की अपनी भावनाएं होती हैं। हम दूर बैठकर किसी के फैसले पर उंगली नहीं उठा सकते। जिस परिवार पर यह बीत रही है, केवल वही उस दर्द को समझ सकता है। इस वीडियो को सिर्फ एक 'मनोरंजन' या 'अजीब' घटना के रूप में देखने के बजाय, एक मरते हुए इंसान की आखिरी खुशी और उसके परिवार के बेइंतहा प्यार के रूप में देखा जाना चाहिए।

आपका इस वीडियो और परिवार के इस फैसले के बारे में क्या सोचना है? क्या परिवार ने युवक की यह इच्छा पूरी करके सही किया या उन्हें उसे भगवान के भजन सुनाने चाहिए थे? कमेंट करके अपनी राय जरूर साझा करें।



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