भारत का फ़ूड एक्सपोर्ट संकट: क्या हम खुद जहर खा रहे हैं?

 

आजकल सोशल मीडिया और ग्लोबल न्यूज में एक ही चर्चा है—"इंडियन फ़ूड प्रोडक्ट्स पर बैन"। भारत का नाम दुनिया भर में मसालों, आम और जड़ी-बूटियों के लिए जाना जाता है, लेकिन हाल ही में जो खबरें सामने आई हैं, उन्होंने हर भारतीय को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ हमारे प्रोडक्ट्स विदेशों में रिजेक्ट हो रहे हैं, और दूसरी तरफ यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जो खाना हमारे खुद के देश में बिक रहा है, क्या वह सुरक्षित है?

​आइए इस पूरे मामले को गहराई से समझते हैं कि आखिर ग्लोबल मार्केट में क्या चल रहा है और हमारे किचन तक पहुंचने वाली चीजों की क्या हकीकत है।

​बड़े ब्रैंड्स और उनके बड़े खुलासे

​वीडियो और हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत के कई नामी-गिरामी ब्रैंड्स विदेशी जांच एजेंसियों की रडार पर आ चुके हैं। इनमें कुछ ऐसे नाम शामिल हैं जो हर भारतीय घर की रसोई या बाथरूम का हिस्सा हैं:

​1. डाबर (Dabar) और यूएस एफडीए (US FDA) की रेड

​डाबर एक ऐसा ब्रैंड है जिस पर आंख बंद करके भरोसा किया जाता है। लेकिन अमेरिकी रेगुलेटर US FDA (Food and Drug Administration) ने डाबर की एक मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का निरीक्षण किया, तो वहां कई हैरान करने वाली कमियां पाई गईं। रिपोर्ट के अनुसार, फैक्ट्री में साफ-सफाई की भारी कमी थी, रिकॉर्ड्स में हेरफेर पाया गया और यहां तक कि वहां चिड़ियों की मौजूदगी और उनकी बीट (bird infestation) के निशान भी मिले।

​2. सिंगापुर और हांगकांग में भारतीय मसालों पर बैन

​साल 2024 की शुरुआत में MDH और Everest जैसी दिग्गज कंपनियों के मसालों को सिंगापुर और हांगकांग में प्रतिबंधित कर दिया गया था। जांच में पाया गया कि इन मसालों में एथिलीन ऑक्साइड (Ethylene Oxide) की मात्रा तय सीमा से कहीं ज्यादा थी। आपको बता दें कि यह एक ऐसा केमिकल है जिसे लंबे समय तक कंज्यूम करने से ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) और ब्रेस्ट कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं।

​3. फल और सब्जियों का रिजेक्शन

​सिर्फ पैक्ड फूड ही नहीं, बल्कि हमारे फ्रेश फूड एक्सपोर्ट्स पर भी उंगलियां उठ रही हैं:

  • चीन ने भारत से जाने वाली लाल मिर्च (Red Chillies) के कंसाइनमेंट को रिजेक्ट कर दिया क्योंकि उसमें खतरनाक कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाले) तत्व मिले, जो नर्वस सिस्टम को डैमेज कर सकते हैं।
  • जापान ने भारतीय आमों (Mangoes) की खेप को लौटा दिया।
  • भूटान ने भारत से जाने वाली हरी मिर्च पर पाबंदी लगाई।
  • यूरोपियन यूनियन (EU) का कड़ा रुख: एक चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि यूरोप को भेजे जाने वाले भारतीय फूड आइटम्स का रिजेक्शन रेट पहले जहां सिर्फ 5% था, वह अब बढ़कर 20% हो चुका है। यानी हर 5 में से 1 भारतीय फूड कंसाइनमेंट वहां रिजेक्ट हो रहा है।


    ​दोहरी नीति: एक्सपोर्ट क्वालिटी बनाम डोमेस्टिक क्वालिटी

    ​इस पूरे विवाद में जो सबसे कड़वा सच सामने आया है, वह है "क्वालिटी का दोहरा मापदंड"। फूड इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि कंपनियां विदेशों में भेजने वाले माल के लिए अलग और बेहतर क्वालिटी स्टैंडर्ड रखती हैं, जबकि भारतीय बाजारों में बिकने वाले माल के लिए क्वालिटी स्टैंडर्ड काफी ढीले होते हैं।

    ​जब विदेशी सरकारों ने भारतीय मसालों पर सवाल उठाए, तो हमारी फूड रेगुलेटरी बॉडी FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने शुरुआती दौर में इन आरोपों को खारिज करने की कोशिश की। बाद में जब दबाव बढ़ा, तो उन्होंने केवल 'एक्सपोर्ट' होने वाले मसालों की लैब टेस्टिंग को अनिवार्य किया।

    सवाल यह उठता है: क्या भारत के नागरिकों की सेहत की कीमत विदेशों में रहने वाले लोगों से कम है? क्या हमें जानबूझकर कम क्वालिटी का या मिलावटी सामान परोसा जा रहा है?

    ​एक्सपर्ट ओपिनियन: क्यों फेल हो रहा है हमारा सिस्टम?

    ​फूड सेफ्टी एक्सपर्ट्स और वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समस्या की जड़ें काफी गहरी हैं। भारत में फूड सेफ्टी को लेकर कई बुनियादी खामियां हैं:

    • पेस्टिसाइड्स का अंधाधुंध इस्तेमाल: भारतीय किसान फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए भारी मात्रा में और बिना किसी गाइडलाइन के कीटनाशकों (Pesticides) का छिड़काव करते हैं। यही केमिकल बाद में मसालों और फलों के जरिए हमारे शरीर में जाते हैं।
    • ढीला इंफोर्समेंट और इंस्पेक्शन: भारत में कानून तो हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर फूड इंस्पेक्टर्स की भारी कमी है। फैक्ट्रियों का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) न के बराबर होता है, जिससे कंपनियों को लापरवाही बरतने की छूट मिल जाती है।
    • जागरूकता की कमी: आम भारतीय उपभोक्ता अक्सर पैकेट के पीछे लिखे इंग्रीडिएंट्स या न्यूट्रिशन वैल्यू को नहीं पढ़ता। हम केवल ब्रैंड के नाम और विज्ञापन देखकर चीजें खरीद लेते हैं।

    ​आत्मनिर्भर बनें: घर पर कैसे करें जरूरी चीजों की जांच?

    ​जब तक सरकारी सिस्टम पूरी तरह दुरुस्त नहीं होता, तब तक हमें खुद अपनी और अपने परिवार की सेहत की जिम्मेदारी उठानी होगी। रसोई में इस्तेमाल होने वाली आम चीजों में मिलावट को आप घर पर ही बेहद आसान तरीकों से पकड़ सकते हैं:

    • दूध (Milk): दूध की एक बूंद को किसी चिकनी लकड़ी या पत्थर की सतह पर टपकाएं। अगर दूध शुद्ध होगा, तो वह धीरे-धीरे बहेगा और पीछे सफेद धार छोड़ जाएगा। अगर उसमें पानी या डिटर्जेंट की मिलावट होगी, तो वह बिना कोई निशान छोड़े तेजी से बह जाएगा।
    • गैजेट्स/घी (Ghee): एक चम्मच घी में थोड़ा सा हाइड्रोक्लोरिक एसिड और एक चुटकी चीनी मिलाएं। अगर घी का रंग लाल हो जाता है, तो समझ लें कि इसमें डालडा या वनस्पति तेल की मिलावट है।
    • हल्दी पाउडर (Turmeric Powder): एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच हल्दी डालें और उसे बिना हिलाए छोड़ दें। अगर हल्दी शुद्ध होगी, तो वह गिलास के नीचे बैठ जाएगी और पानी हल्का साफ रहेगा। अगर पानी का रंग बहुत गहरा पीला या धुंधला हो जाता है, तो उसमें केमिकल कलर मिलाया गया है।
    • लाल मिर्च पाउडर (Red Chilli Powder): एक गिलास पानी में एक चम्मच मिर्च पाउडर डालें। अगर मिर्च में ईंट का चूरा या रेत होगी, तो वह तुरंत नीचे बैठ जाएगी। असली मिर्च पानी की सतह पर तैरती रहेगी।
    • शहद (Honey): एक रुई के फाहों को शहद में डुबोकर आग लगाएं। अगर शहद शुद्ध होगा, तो रुई आसानी से जल जाएगी। अगर उसमें चाशनी या पानी की मिलावट होगी, तो चटचट की आवाज आएगी और वह ठीक से नहीं जलेगा।

    ​आगे का रास्ता: क्या बदलाव जरूरी हैं?

    ​भारत को अगर ग्लोबल मार्केट में अपनी साख बचानी है और अपने नागरिकों को बीमारियों से बचाना है, तो कड़े कदम उठाने ही होंगे।

    1. 'वन नेशन, वन क्वालिटी' नीति: जो क्वालिटी स्टैंडर्ड एक्सपोर्ट के लिए तय किए जाते हैं, वही स्टैंडर्ड देश के भीतर बिकने वाले सामानों पर भी सख्ती से लागू होने चाहिए।
    2. सख्त सजा का प्रावधान: मिलावटखोरी करने वाली कंपनियों और अधिकारियों पर भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान होना चाहिए ताकि कोई भी लोगों की जान से खिलवाड़ न कर सके।
    3. ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा: पेस्टिसाइड्स के इस्तेमाल को कम करने के लिए किसानों को जैविक खेती की तरफ मोड़ना होगा और उन्हें सही ट्रेनिंग देनी होगी।

    निष्कर्ष: यह संकट सिर्फ हमारे एक्सपोर्ट बिजनेस का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारी थाली और हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। जब तक उपभोक्ता के तौर पर हम आवाज नहीं उठाएंगे और सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक ब्रैंड्स और सिस्टम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे। अपनी सेहत के प्रति सतर्क रहें, जागरूक बनें!

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