भूमिका
कहते हैं कि राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं और जो होता है, वो कभी आसानी से दिखता नहीं। हमारे देश में नेताओं का जनता को नसीहतें देना और बड़ी-बड़ी तकरीरें (भाषण) झाड़ना कोई नई बात नहीं है। सुबह से लेकर शाम तक टीवी चैनलों और रैलियों में 'धर्म', 'संस्कृति' और 'खान-पान' पर लंबे-चौड़े लेक्चर देने वाले जब खुद कटघरे में खड़े होते हैं, तो मानो पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लग जाता है। ऐसा ही एक ताज़ा मामला सोशल मीडिया पर गर्माया हुआ है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद और अभिनेता रवि किशन के जूतों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में मुंबई में आयोजित एक भव्य इवेंट 'बॉम्बे टाइम्स हेडलाइनर्स' के रेड कार्पेट पर रवि किशन सफ़ेद लिबास में नज़र आए। उनका यह अंदाज़ हमेशा की तरह रौबीला था, लेकिन सोशल मीडिया के तीखे बाज़ जैसी नज़रों वाले यूज़र्स का ध्यान उनके जूतों पर जाकर टिक गया। उन्होंने जो हरे रंग के फुटवियर पहने हुए थे, उन्हें लेकर इंटरनेट पर यह दावा किया जाने लगा कि वे चमड़े (लेदर) के बने हैं।
अब आप सोचेंगे कि इसमें कौन सी बड़ी बात है? नेता हो या अभिनेता, चमड़े के जूते तो हर कोई पहनता है। लेकिन बात तब बिगड़ जाती है जब यही नेता जनता के सामने अपनी एक अलग छवि पेश करते हैं।
'भिंडी-भुजिया' का ज्ञान और ज़मीनी हकीकत
वीडियो में बोलने वाले वक्ता ने बड़े ही देसी और सीधे लहजे में रवि किशन पर तंज कसा है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे रवि किशन अक्सर लोगों को नॉन-वेज न खाने, बीफ़ से दूर रहने और सादा जीवन अपनाने की सलाह देते हैं। उनका वह मशहूर बयान तो सबको याद ही होगा जहाँ वे कहते हैं— "नॉन-वेज मत खाओ, भिंडी और भुजिया खाओ।" > "दूसरों को गाय, भैंस, धर्म और खान-पान पर लंबा-लंबा लेक्चर देने वाले नेता खुद किन चीज़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या यह जनता को जानने का हक़ नहीं है?"
जब आप जनता के सामने एक 'गौ-रक्षक' या 'संस्कृति के रखवाले' के रूप में खुद को पेश करते हैं, तो आपकी हर एक चीज़—चाहे वह आपके विचार हों या आपके पैर का जूता—जनता की कसौटी पर कसी जाएगी। सोशल मीडिया पर लोग अब यही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या दूसरों को शाकाहार का पाठ पढ़ाने वाले खुद ऐसे प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं जो जीव-जंतुओं को नुकसान पहुँचाकर बनते हैं?
चुप्पी साधने से नहीं बदलेगी सच्चाई
वक्ता का यह भी कहना है कि जब भी ऐसे वीआईपी या राजनेताओं से उनकी व्यक्तिगत पसंद या उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ों पर सवाल किए जाते हैं, तो वे अक्सर चुप्पी साध लेते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जिस नेता को उन्होंने चुनकर संसद में भेजा है, उसकी कथनी और करनी में कितना अंतर है। अगर वे जूते चमड़े के नहीं हैं, तो इस पर साफ़-सफाई (Clarification) आनी चाहिए। लेकिन जब तक इस पर चुप्पी बनी रहेगी, तब तक सवाल उठते रहेंगे।
हमारा नज़रिया: राजनीति में 'कथनी और करनी' का अंतर (Our Opinion)
अब बात करते हैं इस पूरे मामले के सबसे ज़रूरी पहलू की। यह मुद्दा सिर्फ़ रवि किशन या किसी एक पार्टी का नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी राजनीतिक संस्कृति की उस कमज़ोरी को दर्शाता है जिसे हम 'दोगुना मापदंड' (Double Standards) कहते हैं।
हमारा मानना है कि: "राजनीति में पवित्रता सिर्फ़ भाषणों में नहीं, बल्कि आचरण में भी दिखनी चाहिए। यदि आप जनता के लिए कोई आदर्श तय कर रहे हैं, तो सबसे पहले उस रास्ते पर आपको खुद चलना होगा। पैर के जूतों की कीमत या ब्रैंड से किसी को आपत्ति नहीं है, आपत्ति इस बात से है कि जब आप मंच पर खड़े होकर सादगी और धर्म का चश्मा पहनते हैं, तो पर्दे के पीछे की आपकी लग्ज़री लाइफस्टाइल जनता के भरोसे को ठेस पहुँचाती है।"
आज की जनता जागरूक है, डिजिटल युग की है। वह सोशल मीडिया की ज़ूम (Zoom) लेंस से आपके कपड़ों की सिलाई से लेकर जूतों की लेदर क्वालिटी तक सब कुछ परख सकती है। आप जनता को 'भिंडी-भुजिया' खाने की सलाह देकर खुद मखमली और आलीशान ज़िंदगी के मजे नहीं ले सकते, और अगर लेते हैं, तो फिर मंच पर आकर नैतिकता का ज्ञान देना बंद करना होगा।
निष्कर्ष
दूसरों को नसीहत देने से पहले खुद के आचरण को देखना बेहद ज़रूरी है। आज की जनता अब नेताओं की खोखली तकरीरों को समझ चुकी है। वह केवल शब्दों के जाल में नहीं फँसने वाली, वह अब एक्शन देखना चाहती है। चाहे मामला किसी फुटवियर का हो या किसी बड़े घोटाले का, पारदर्शिता हर जगह होनी चाहिए। अगर नेताजी चाहते हैं कि लोग उनकी बातों पर यकीन करें, तो उन्हें अपनी कथनी और करनी के बीच की इस गहरी खाई को पाटना ही होगा। आखिर में, जनता जनार्दन है और वह सब कुछ बखूबी समझ रही है!
