आस्था के केंद्र पर ये कैसी अयाशी? जब देवी के धाम में ही सुरक्षित नहीं हैं देवियां!

 


आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का सिर शर्म से झुक जाएगा। वीडियो असम के सुप्रसिद्ध कामाख्या देवी मंदिर का बताया जा रहा है। इस वीडियो में साफ दिख रहा है कि भारी भीड़ के बीच रास्ता न मिलने पर एक लड़का और एक लड़की पहाड़ी के किनारे वाले रास्ते से ऊपर की तरफ आ रहे हैं।

​नीचे खड़ी लड़कों की हुड़दंगी भीड़ उन्हें देखकर हूटिंग करने लगती है, फब्तियां कसती है और हद तो तब हो जाती है जब भीड़ में से कोई उस लड़की के सिर पर ज़ोर से पानी की बोतल मारकर फेंक देता है। वह लड़की वहीं रोने लगती है।

​एक तरफ हम नारी को देवी का रूप मानते हैं, और दूसरी तरफ 'मां कामाख्या' के पवित्र धाम में, जहाँ नारी शक्ति की पूजा होती है, वहाँ एक लड़की के साथ ऐसी ओछी हरकत की जाती है। यह घटना सिर्फ एक वीडियो नहीं, बल्कि हमारे समाज के खोखलेपन और गिरते नैतिक स्तर का एक बड़ा सबूत है।

​1. आस्था के नाम पर हुड़दंग: आखिर कमी कहाँ है?

​हमारे देश में त्योहारों और धार्मिक स्थलों पर जुटने वाली भीड़ का एक अलग ही महत्व है। लोग दूर-दूर से मन्नतें लेकर आते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है—"धार्मिक पर्यटन (Religious Tourism) के नाम पर पिकनिक मनाना।"

  • लापरवाह रवैया: बहुत से युवा धार्मिक स्थलों पर भक्ति भाव से नहीं, बल्कि सिर्फ घूमने-फिरने, रील बनाने या दोस्तों के साथ टाइमपास करने जाते हैं।
  • भीड़ का फायदा उठाना: जब किसी जगह पर पैर रखने की जगह नहीं होती, तो कुछ असामाजिक तत्व भीड़ का फायदा उठाकर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बदतमीजी करने को अपना 'मज़े का साधन' समझ लेते हैं।
  • संस्कारों का अभाव: जो लड़के पवित्र मंदिरों में जाकर भी महिलाओं का सम्मान नहीं कर सकते, वे असल जिंदगी में अपनी बहनों या माताओं को क्या सम्मान देते होंगे, यह एक बड़ा सवाल है।

​2. 'कामाख्या धाम' का महत्व और यह विरोधाभास

​कामाख्या देवी मंदिर सनातन धर्म के सबसे प्रमुख और जाग्रत ५१ शक्तिपीठों में से एक है। यह वह जगह है जहाँ प्रकृति और नारीत्व की सर्वोच्च शक्ति (Menstruation/नारीत्व के चक्र) को पूजा जाता है।

बड़ा विरोधाभास: जिस मंदिर के गर्भगृह के सामने लोग सिर झुकाकर स्त्री शक्ति से आशीर्वाद मांगते हैं, उसी मंदिर के प्रांगण में एक जीवित स्त्री पर बोतल फेंककर उसे रुला दिया जाता है। यह कैसी आस्था है? क्या हमारी भक्ति सिर्फ पत्थरों तक सीमित रह गई है?


​3. युवाओं की मानसिकता और सोशल मीडिया का 'अटेंशन सीकिंग' रोग (एक्सपर्ट ओपिनियन)

​समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) के अनुसार, ऐसी घटनाओं के पीछे गहरी मानसिक विकृतियां काम कर रही हैं:

​भीड़ की मानसिकता (Mob Psychology)

​जब कोई व्यक्ति अकेले होता है, तो वह कानून और समाज से डरता है। लेकिन जब वह एक बड़ी भीड़ का हिस्सा बनता है, तो उसे लगता है कि 'पकड़े गए तो सब पकड़े जाएंगे, नहीं तो कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।' इसी को 'डी-इंडिविजुएशन' कहते हैं, जहाँ इंसान अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी भूलकर हिंसक या असभ्य हो जाता है।

​'कूल' दिखने की चाहत

​आजकल के कुछ युवाओं में हूटिंग करने, दूसरों को परेशान करने या कानून तोड़ने को 'कूल' या 'मर्दानगी' का प्रतीक माना जाने लगा है। सोशल मीडिया पर सस्ते रील्स और भड़काऊ कंटेंट ने इस सोच को और हवा दी है।

​4. ऐसे मामलों को रोकने के लिए ठोस कदम (अहम सुझाव)

​अगर हमें अपने तीर्थ स्थलों की पवित्रता और देश की बेटियों की सुरक्षा को बचाना है, तो सिर्फ वीडियो बनाकर दुख जताने से काम नहीं चलेगा। प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे:

  • 'जीरो टॉलरेंस' सिक्योरिटी ज़ोन: हर बड़े मंदिर और धार्मिक स्थल पर सीसीटीवी कैमरों का ऐसा जाल होना चाहिए जिससे कोई भी कोना न छूटे। हुड़दंग करने वालों को तुरंत मौके पर ही गिरफ्तार किया जाना चाहिए।
  • सादे कपड़ों में पुलिस (Undercover Cops): भीड़भाड़ वाले संवेदनशील इलाकों में महिला और पुरुष पुलिसकर्मियों को सादे कपड़ों में तैनात किया जाना चाहिए, ताकि वे ऐसे मजनुओं और असामाजिक तत्वों को रंगे हाथों दबोच सकें।
  • धार्मिक स्थलों पर कड़े नियम: जो लोग भी हुड़दंग मचाते या शराब/नशे की हालत में पाए जाएं, उन पर भारी जुर्माना लगाने के साथ-साथ उनके मंदिर प्रवेश पर आजीवन प्रतिबंध (Ban) लगा दिया जाना चाहिए।
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट: महिलाओं से छेड़छाड़ के ऐसे मामलों की सुनवाई हफ्तों में होनी चाहिए और सजा इतनी सख्त हो कि अगली बार कोई भी ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे।

​5. देश का नाम बदनाम करने वाले ये 'चंद' लोग

​जैसा कि वीडियो में सही कहा गया है, "हमारे देश के लड़के एक मौका नहीं छोड़ते देश का नाम बदनाम करने का।" जब विदेशी सैलानी भारत आते हैं और ऐसी घटनाओं को देखते हैं या सुनते हैं, तो पूरी दुनिया में भारत की छवि एक 'असुरक्षित देश' के रूप में बनती है।

​कुछ मुट्ठी भर जाहिलों की वजह से उन सभी भारतीय पुरुषों को भी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है, जो महिलाओं का दिल से सम्मान करते हैं। यह गंदगी तब तक साफ नहीं होगी जब तक भीड़ में खड़े बाकी लोग मूकदर्शक बने रहने के बजाय ऐसे हुड़दंगियों का विरोध करना शुरू नहीं करेंगे।

​निष्कर्ष: खुद को बदलने का समय आ गया है

​कामाख्या मंदिर की यह घटना सिर्फ एक लड़की के साथ हुई बदतमीजी नहीं है, बल्कि यह हमारे सामूहिक ज़मीर पर एक गहरा तमाचा है। अगर हम मंदिर में खड़ी 'पत्थर की देवी' के सामने तो हाथ जोड़ते हैं, लेकिन रास्ते में चलती 'जीती-जागती देवी' पर बोतल फेंकते हैं, तो हमारी पूजा, हमारा धर्म और हमारी आस्था सब ढोंग है।

​अब समय आ गया है कि हम केवल सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठें। अपने घरों में लड़कों को 'नारी सम्मान' के असली संस्कार दें। अगर अगली बार किसी भी जगह पर कोई लड़का किसी लड़की को परेशान करे, तो वहाँ खड़े होकर तमाशा देखने या वीडियो बनाने के बजाय, उस हुड़दंगी को सबक सिखाएं। जब तक समाज खुद खड़ा नहीं होगा, तब तक हमारी बेटियां न सड़कों पर सुरक्षित होंगी और न ही भगवान के दरबार में।

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